अक्सर जब वो,
कुछ बाते करते हें ,
तो पता नहीं ऐसा क्यों लगता हे ?
की बात मेरे बारे में ही छिड़ी हो ...?
मेरा बहम या,
प्यार का पागलपन
जब उनसे पूछो हसने की बजह ,
तो उनका कहना .........!
"कुछ नहीं "
दिल में पता नहीं क्यों ?
एक तूफान मचा जाती हैं.....!
पर उनका ये अल्फाज़ .....
मेरे दिल को बहुत भाता हैं .......!
This blog is useful for competitor students who is prepare for government job..........................
Sunday, October 31, 2010
Wednesday, September 29, 2010
धर्मांध

आज फिर लोग परेंशा क्यों हें !
क्या हमारा देश फिर सुलगने वाला हे ?
देश का हर वर्ग....! जानना चाहता हे की ........!
जीत आखिर किसकी होगी ...
राम की या रहीम की .....................?
आखिर ये धर्मांध,
कब समझ पाएंगे कोई भी हारे ॥!
असली हार तो मानवता की होगी
हम सिर्फ ब्याख्यान देते हे ,
" इश्वर एक हैं "
अमल नहीं करते !
अगर अमल करते तो ,
आज ये नौवत ही नहीं आती ...?
अगर वास्तव में इश्वर एक हें ,
तो न राम और न ही रहीम की हार होगी !
ये इश्वर की हार होगी...!
क्या फर्क पर जायेगा अगर वहां ,
मंदिर बने या मस्जिद ,
अगर हम उस
पालनकर्ता के सच्चे हितेषी हे ।!
तो क्यों न ?
वहां ऐसी ईमारत की बुनियाद रखी जाये ,
जो मानवता की सच्ची सेवा कर सके ...?
जिसपे हिन्दू ,मुस्लिम तथा देश के अन्य संप्रदाय को नाज़ हो!
देश का हर वर्ग....! जानना चाहता हे की ........!
जीत आखिर किसकी होगी ...
राम की या रहीम की .....................?
आखिर ये धर्मांध,
कब समझ पाएंगे कोई भी हारे ॥!
असली हार तो मानवता की होगी
हम सिर्फ ब्याख्यान देते हे ,

" इश्वर एक हैं "
अमल नहीं करते !
अगर अमल करते तो ,
आज ये नौवत ही नहीं आती ...?
अगर वास्तव में इश्वर एक हें ,
तो न राम और न ही रहीम की हार होगी !
ये इश्वर की हार होगी...!
क्या फर्क पर जायेगा अगर वहां ,
मंदिर बने या मस्जिद ,
अगर हम उस
पालनकर्ता के सच्चे हितेषी हे ।!तो क्यों न ?
वहां ऐसी ईमारत की बुनियाद रखी जाये ,
जो मानवता की सच्ची सेवा कर सके ...?
जिसपे हिन्दू ,मुस्लिम तथा देश के अन्य संप्रदाय को नाज़ हो!
Wednesday, September 22, 2010
करवाहट जीवन की........!

जिन्दगी में अहसास ,
कुछ इस तरह मिला की हम खुद को ही खो बैठे
हम उन्हें चाहते हे दिलबर की तरह,
वो मुझसे रहते हे ,कुछ रूठे-रूठे ,
अब तो डरता हु अपने ही वजूद से |
न जाने जिन्दगी किस मोड़ पर,
क्या गुनाह कर बैठे ?
क्या ? मेरे ही दिल में तमन्ना है उन्हें पाने का,
या , वो भी तडपते होंगे मेरे लिए ,
शायद ये मेरा वहम हे , या उनका दिल बेरहम हे !
इसलिए तो वो मुझसे रहते हे कुछ ऐठे - ऐठे ,
तभी तो डरता हु अपने वजूद से ,
न जाने जिन्दगी किस मोड़ पर,
क्या गुनाह कर बैठे ?
Tuesday, August 31, 2010
साक्षरता ! (रश्मि आर्य)
ई निरक्षरता, पर साक्षर होना कब मना था ,
अध्यापक के हाथ से भब्य जो मंदिर बना था
स्वपन में सपना सजा था ,
शब्दों में वह कब सजा था
रह गया निरक्षर
लेकिन साक्षर होना कब मना था,
है भविष्य में जो अँधियारा ,
प्रकाश लाना कब मना था
जिन्दगी अंधियारे से भरी थी
आँखों से मस्ती झलकती ,
पर साक्षरता का नाम नहीं था
पुरखो ने भी नहीं देखा शब्द किस बाला का नाम है,
ऐसा अंधकार उस समय बड़ा था
करती थी म्हणत मजदूरी मैं ,
पर साक्षर होने का नाम नहीं था,
माँ-बाप ने भी झोका भाद में मुझे ,
न सोचा पढाई के बारे में
यही अन्याय उनका बड़ा था,
रोता था मैं दिन रो रत को ,
न थी मेरी परबह किसी परिवार को,
साक्षर होना सपना था मेरा
न हुआ कभी वो मेरा
दुत्कारते थे साक्षर लोग मुझे
लेकिन साक्षर होना कब मना था
हंसी वो मेरी खो ही गयी थी ,
न जाने कहा उड़ सी गयी थी,
शर्म तो मुझे आती थी साक्षर के सामने ,
पर मेरे नसीब में निरक्षर होना लिखा था,
फिर एक दिन में साक्षर हुई ,
अक्षर भागते थे भूख-प्यास मेरी
आखिरकार सपना हुआ मेरा भी पूरा
पहुंची थी बिकसित देश में
मिली थी जानकारी मुझे सबसे ज्यादा
पूछते थे प्रशन मुझसे सभी लोग
किया मैंने अबिष्कार नये तकनीक का
लेकिन आता था रोष मुझे उन गरीब बेचारो बच्चो पर
जो करते थे मजदूरी अपने पेट के लिए
फिर एक दिन मैंने सोचा
क्यों न करू में सेवा इनकी
फिर बनाया साक्षर सभी को
लिया मैंने खुद से एक बड़ा
बनाया साक्षर बच्चे व बुजुर्ग ज्यादा
ताकि मेरे देश की मिटे निरक्षरता ,
और फैले साक्षरता का उजियारा।
अध्यापक के हाथ से भब्य जो मंदिर बना था
स्वपन में सपना सजा था ,
शब्दों में वह कब सजा था
रह गया निरक्षर
लेकिन साक्षर होना कब मना था,
है भविष्य में जो अँधियारा ,
प्रकाश लाना कब मना था
जिन्दगी अंधियारे से भरी थी
आँखों से मस्ती झलकती ,
पर साक्षरता का नाम नहीं था
पुरखो ने भी नहीं देखा शब्द किस बाला का नाम है,
ऐसा अंधकार उस समय बड़ा था
करती थी म्हणत मजदूरी मैं ,
पर साक्षर होने का नाम नहीं था,
माँ-बाप ने भी झोका भाद में मुझे ,
न सोचा पढाई के बारे में
यही अन्याय उनका बड़ा था,
रोता था मैं दिन रो रत को ,
न थी मेरी परबह किसी परिवार को,
साक्षर होना सपना था मेरा
न हुआ कभी वो मेरा
दुत्कारते थे साक्षर लोग मुझे
लेकिन साक्षर होना कब मना था
हंसी वो मेरी खो ही गयी थी ,
न जाने कहा उड़ सी गयी थी,
शर्म तो मुझे आती थी साक्षर के सामने ,
पर मेरे नसीब में निरक्षर होना लिखा था,
फिर एक दिन में साक्षर हुई ,
अक्षर भागते थे भूख-प्यास मेरी
आखिरकार सपना हुआ मेरा भी पूरा
पहुंची थी बिकसित देश में
मिली थी जानकारी मुझे सबसे ज्यादा
पूछते थे प्रशन मुझसे सभी लोग
किया मैंने अबिष्कार नये तकनीक का
लेकिन आता था रोष मुझे उन गरीब बेचारो बच्चो पर
जो करते थे मजदूरी अपने पेट के लिए
फिर एक दिन मैंने सोचा
क्यों न करू में सेवा इनकी
फिर बनाया साक्षर सभी को
लिया मैंने खुद से एक बड़ा
बनाया साक्षर बच्चे व बुजुर्ग ज्यादा
ताकि मेरे देश की मिटे निरक्षरता ,
और फैले साक्षरता का उजियारा।
Tuesday, July 27, 2010
दुर्घटना
सुबह सुबह जब मैंने आँख खोली तो
एक अजीब सा मंजर सामने था
जिसे मैंने अभी-अभी ,
स्वपन में कुछ देर पहले महसूस किया
वही हाथ में लिए खंजर सामने था
एक अजीब सा मंजर सामने था
जिसे मैंने अभी-अभी ,
स्वपन में कुछ देर पहले महसूस किया
वही हाथ में लिए खंजर सामने था
Tuesday, July 13, 2010
जीवन मेरी एक कविता हैं ...!
अभिलाषा हैं , तो पढ़ लेना
नीरसता का सागर हे , ये
हो सके तो प्रतिमा गढ़ लेना ....!
हैं किसके पास वक़्त यहाँ,
कवि की बातो को समझ सके..!
हैं किसकी अभिलाषा ऐसी ,
नीरसता में गोते लगा सके...!
मैं सत्य हमेशा दिखलाता ...!
हो सके तो सत्य समझ लेना,
जीवन मेरी एक कविता हैं ...!
अभिलाषा हैं , तो पढ़ लेना.......!
अभिलाषा हैं , तो पढ़ लेना
नीरसता का सागर हे , ये
हो सके तो प्रतिमा गढ़ लेना ....!
हैं किसके पास वक़्त यहाँ,
कवि की बातो को समझ सके..!
हैं किसकी अभिलाषा ऐसी ,
नीरसता में गोते लगा सके...!
मैं सत्य हमेशा दिखलाता ...!
हो सके तो सत्य समझ लेना,
जीवन मेरी एक कविता हैं ...!
अभिलाषा हैं , तो पढ़ लेना.......!
Sunday, June 27, 2010
भीख
माँ मैं कितनी प्यारी हूँ |लोग यही कहते हैं न !
लेकिन मुझे पता है ....!
की तू भी मुझसे प्यार नहीं करती !
ये आँचल मुझे हमेशा आपकी याद दिलाती हे |
आपके प्यारे अहसास को ,
उस ममता की,
जिसके तले मैंने अपनी आंखे खोली |
जहाँ से मैंने इस दुनियां को निहारा |
मेरी भी तमन्ना है ,
आसमान को समेटने की ,
इसी नन्हे आँचल में |
लेकिन क्या .....?

ये तमन्ना पूरी हो पायेगी |
इस पुरुष प्रधान देश में ,
जहाँ लडकियों को गर्भ में ही मार दिया जाता हैं !
क्या मैं भी ....? आपकी तरह
किसी को आँचल दे पाउँगा |
ताकि ये पर्था जीवंत रहे |
लेकिन तब , जब मैं भी ,
खुल कर जी सकूँगा |
लेकिन तब , जब मैं भी उन्मुक्त होकर
अपने पंख पसार सकूँगा |
लेकिन ये तभी संभव हैं ,
जब मुझे आज़ाद पंछी की तरह
हर जगह फुदकने का मौका मिले
नहीं तो मेरी कोरी कल्पना,
बस धरी की धरी रह जाएँगी ,
तब मेरी ये आँचल सिमट कर रह जाएँगी |
माँ मुझे इतना बता दे क्या तू मुझे सचमुच प्यार नहीं करती ?
शायद...........!
तू भी नहीं चाहती की मैं इस दुनिया में आऊं....|
अगर चाहती हैं तो जन्म देने में हिचकती क्यों हैं ....?
और अगर जन्म दे भी दे तो .......!
मेरे पर काट कर मुझे पंखहीन क्यों बना देती है ?
तू मुझे उड़ने क्यों नहीं देती |
क्या तू डरती हे
कही ये डर तो नहीं की मैं तुम्हारे बेटे से ज्यादा आगे न बढ़ जाऊं |
मुझे मौका दो माँ.....|
फिर देख कौन तुझे कितना प्यार करता हैं ?
बस अब मैं क्या कहू...!
बाकि आप भी तो एक लड़की थी फिर मेरे साथ ऐसा अन्याय क्यों ?????
मुझे आपकी दौलत नहीं , आपका स्नेह ,आपकी ममता चाहिए |
और कुछ नहीं चाहिए
मेरी आँचल में बस यही भीख समझ कर दाल दो ?
मुझे यही चाहिए.................?????
आपकी प्यारी बिटिया.................................!!!!!!!
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