मुझे अजीब लगता है |
जब संघर्ष विराम की और कुच करता है !!
जब मानवता वर्तमान के बारे में कम और,
भविष्य के बारे में ज्यादा सोचती हैं |
लहू की बूंद जमी हुई मालूम पड़ती है ,
सोचता हूँ आगे क्या हैं ?
कोई खतरनाक मोड़ या,
संघर्ष की अवस्था या कोई ,अद्भुत परिकल्पना,
जहाँ मैं अपने आप को अकेला पाता हूँ |
खैर कोई बात नहीं....! चलता है ,
जीवन इसी को तो कहते है जहाँ ,
रुकाबट,पर्तीक्षा ,परीक्षा, और संघर्ष
इनके बिना जीवन की परिकल्पना,
अधूरी सी दिखती है !!
पर कुछ मामलो में ,मैं अपने आप को ठहरा हुआ पाता हूँ|
कोई मेरे जज्बातों से खेल जाता है ,
मैं समझ नहीं पता ,
जो मेरे दिल को अच्छा लगता है या लगती है ,
बाद में उसी से नफरत क्यों हो जाता हैं |
ये मेरा अहम् है या कुछ और ,
किससे पुछू .......? कैसे पुछू .......?
लेकिन जानना तो पड़ेगा |
वर्ना मैं घुट घुट कर मर जाऊंगा |
मैं मरना नहीं चाहता ,
मैं जानना चाहता हूँ सच क्या हें |
देख लिया ,
उसे जो मेरे चारो और रहते हें,
सिर्फ दिखाबा है ,जो मेरी कल्पना के अन्दर तो है,
पर धुंधली सी ||
जाने कब.....? ये अपनी असलियत बता पाएंगे,
लेकिन मैं भी............................?????